किशोरावस्था की समस्याएं (Problems
of Adolescence)
भारत के सन्दर्भ में किशोरावस्था की
समस्याएं :
किशोरावस्था जीवन
का सबसे कठिन और
नाजुक अवधि होता है
| इस अवस्था में बच्चों
के शारीरिक एवं व्यक्तित्व
सम्बन्धी काफी परिवर्तन
होते हैं । उनमें
इतनी उर्जा
होती है कि
वह चाहे जिस क्षेत्र
में बढे उसमे
काफी प्रगति
कर सकता है अब
वह चाहे धार्मिक
हो या अधार्मिक, देशप्रेमी या
देशद्रोही आदि
कुछ भी बन
सकता है | बालकों
में इस अवस्था
में काफी तीव्र
और आकस्मिक परिवर्तन
होने के कारण
उनमें कई समस्याओं
का जन्म भी हो
जाता है। इसीकारण
इस अवस्था को “समस्या
बाहुल्य की
अवस्था” भी
कहा जाता है
| हालाकि किशोर इन
परिवर्तनों को
अनुभव तो करते
हैं परन्तु
उनके पास कोई
उपयुक्त स्रोत
उपलब्ध नहीं होता
है फलस्वरूप वह अपने सम-आयु
मित्रों से बाते
करता या गुमराह
करने वाली सस्ते
साहित्य का सहायता
लेता है | गलत
सूचनाएं मिलने
के कारण उनमे अक्सर
कई भ्रांतिया आ
जाती हैं जिससे
उनके व्यक्तित्व
विकास पर कुप्रभाव
पड़ता है।
किशोरावस्था में अनेक समस्यायें होती है ये समस्यायें भारतीय किशोरों पर भी लागू होता है जोकि निम्नलिखित हैं :-
व्यवसायिक समस्यायें –
किशोरावस्था भावी जीवन की तैयारी की अवस्था होती है | प्रत्येक किशोर व्यस्क होते होते आत्मनिर्भर बन जाना चाहता है | परन्तु अपनी रूचि और सम्मानजन नौकरी न मिलने के कारण उनके सामने बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो जाती है | ज्यादातर भारत जैसे देशों में निम्न और माध्यम आर्थिक, सामाजिक स्तर वाले किशोरों में ये समस्या अधिक है |
मानसिक प्रताड़ना –
इस अवस्था के बालकों में व्यस्को जैसी काम करने की चाहत होती है पर व्यस्क अक्सर उनको कुछ करने से रोक देते है | जिससे परिवार में उनका किसी न किसी बात पर अनबन होता रहता है | बार बार की डाट से किशोर चिरचिरा स्वभाव का हो जाता है |
व्यक्तिगत समस्याएँ –
इस अवस्था में किशोर किशोरिया आकर्षक दिखना चाहते है ताकि वे अपने विपरीत लिंग वाले को रिझा सके | इसलिए वे हमेशा अपने रंग, रूप, मोटापा, कद, नाक, कपड़े इत्यादि को लेकर सतर्क रहते है | इनमें दोष आते ही वो नकारात्मक भावना से शिकार हो जाते हैं |
आत्महत्या की प्रवृत्तियॉं –
कई किशोरो का सामाजिक विकास ठीक से नहीं हो पाता है या कभी कभार प्रेम में असफलता या परीक्षा पास नहीं कर पाने के कारण वह स्वयं को उपेक्षित, अकेला और शर्म की भावना से घिर जाता है | ऐसी मानसिक तनाव को वो कभी कभार झेल नहीं पाता है और परिणामस्वरूप वह खुदकुशी कर बैठता है |
काल्पनिक दुनिया में रहना –
इस अवस्था के बालक ज्यादातर कल्पना की दुनिया में खोये रहते है | ज्यादातर उनके ख्वाब प्रतिष्ठित नाम के रूप में उभरने, अमीर बनने और आराम की जिंदगी वाली होती है | कई बार इनको पाने की चाह में गलत मार्ग पर जाने से भी नही कतराते है |
तीव्र काम की इच्छा –
इस अवस्था के लड़का हो या लड़की दोनों में व्यः संधि के विकास हो जाने के बाद उनके गुप्तांगो का विकास तेजी से होता है | परिणामस्वरूप उनमे काम (Sex) की इच्छा काफी अधिक बढ़ जाती है | यह अवस्था विशाल नदी के समान उफनती रहती है | कामोत्तेजना का प्रदर्शन विभिन्न रूपों में देखा जा सकता है, जैसे- कामुकतापूर्ण बातें करना, अश्लील बातों को दिवार पर लिखना, कामोत्तेजक चित्रों को बनाना, हस्तमैथुन करना, अश्लील चित्रों और फ़िल्मों को देखना इत्यादि | कई बार काम की इच्छा की चाह में किशोर वेश्या वृति वाले इलाकों की ओर बढ़ जाते या बलत्कार जैसे कुकर्मो को अंजाम दे देते है |
स्वास्थ्य सम्बंधित समस्यायें –
इस अवस्था में किशोरियों में मासिक चक्र और किशोरों में स्वप्न दोष जैसी गुप्तांग सम्बंधित समस्या उत्पन्न हो जाते है | दूसरी ओर श्वेत ग्रंथि और तेल ग्रंथियों के विकास से मुहासे चेहरे पर आने लगते है | जिससे किशोर काफी कुंठित महसूस करते है | कई बार किशोर कामोत्तेजना में असुरक्षित यौन सम्बन्ध भी बना लेते है जिससे एड्स जैसे रोगों का खतरा बढ़ जाता है |
मोबाईल और इन्टरनेट आदि की बुरी लत –
इन दिनों किशोरों में स्मार्ट फोन को लेकर नई समस्या उत्पन्न हुई है | आज लगभग प्रत्येक किशोरों के पास स्मार्ट फ़ोन होते है जिनका वे उपयोग बाते करने, फेसबुक, व्हाट्स अप इत्यादि चलाने के उद्देश्य से करते है | इन चीजो की इनको इतनी बुरी लत लग चुकी है ये अपना पूरा समय फ़ोन में खोये रहकर बिता देते है | साथ ही माता पिता के ध्यान न देने के कारण ये इन्टरनेट पर अश्लील फिल्मे और चित्रों को देख के अपने मनो स्थिति को बिगाड़ भी लेते है |
आक्रामक स्वभाव-
किशोरावस्था को ‘आँधी और तूफान की अवस्था’ कहा जाता है | इस अवस्था में इनके शारीरिक और मानसिक स्थिति में काफी तीव्र गति से परिवर्तन होता है | परिवार और समाज में जो चीजे इनके अनुरूप नहीं होती है उनपर ये जल्दी प्रतिक्रिया कर देते है | अपनी बातों पर अटल रहने को लेकर ये अक्सर आक्रमक भी हो जाते है |
असामाजिक कार्यो में लिप्त होना –
किशोरों की जिंदगी ‘खाओ, पियो और मस्त रहो’ पर आधारित होती है | अगर माता-पिता बच्चों पर ध्यान नही देते है तो वे बुरी आदतों जैसे- लड़कियों को छेड़खानी, नशाखोरी करना एवं जुआ खेलने इत्यादि से ग्रसित हो जाते है | कुछ किशोर पैसे जल्दी पाने की चाह में गलत मार्ग जैसे चोरी और छीन-छोरी कार्यो में भी लिप्त हो जाते है | कभी कभार ये हत्या जैसे काम को अंजाम देने से पीछे नहीं हटते है|
समस्या का निदान (Diagosis of problem)
(A). घर में –
ü किशोरों को नियंत्रित मात्रा में स्वतंत्रता भी देना चाहिए ताकि वे अधिक आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बन सके ।
ü आवश्यकता पड़ने पर यौन शिक्षा की जानकारी किशोरों को समय समय पर देते रहना चाहिए |
ü माता-पिता को चाहिए कि वे किशोरों की गतिविधि पर छिपकर नजर रखे | अगर वो शराब, सिगरेट जैसी नशीले वस्तुओं का सेवन करने लगे है तो समय रहते उसका उपचार करना चाहिए |
ü अपने बच्चों के मित्र मंडली के बारे में जानने के लिए उनको घर बुलाये ताकि पता चले कि आपके बच्चे किस तरह के बच्चो के साथ रह रहे है |
ü स्मार्ट फोन का ज्यादातर उपयोग आज किशोर ही कर रहे है लेकिन स्मार्ट फोन पर उनको ज्यादा देर तक व्यस्त न होने दे |
ü गलत कार्य में लिप्त होने की स्थिति में उनको प्यार से समझाना चाहिए और बार-बार उनको उपदेश न दे |
(B). विद्यालय में –
ü विधालय का अनुशासन बहुत सख्त न हो |
ü विधार्थी की भावनाओं का भी आदर किया जाये ताकि वह स्वतंत्र मन से पढ़ाई में दिलचस्पी ले |
ü शिक्षक हँसमुख एवं उत्साहित हो तों बच्चों में छिपी प्रतिभा को सकारात्मक रूप से जागृत कर सकते है। इसके विपरीत अप्रशिक्षित एवं अयोग्य शिक्षकों से विधायालीय वातावरण में नकारात्मक भाव उत्पन्न होती है जिससे बच्चे पढ़ाई में रूचि कम लेते है और विधालय जाने से भी कतराते है |
ü अगर कोई किशोर पढाई में दिलचस्पी नहीं ले रहा तो उनको दुसरे कार्यो जैसे खेक-कूद , NCC, नृत्य, संगीत इत्यादि कार्य में व्यस्त रखे |
ü अगर कोई किशोर गलत कार्य में लिप्त पाया जाता है तो तुरंत उसपर प्रतिक्रिया दिखाना चाहिए और हो सके तो पहले उनको प्यार से समझाना चाहिए और साथ ही उसके माता-पिता को इसकी सुचना देनी चाहिए |
ü Parent-Teacher’s मीटिंग का आयोजन बराबर होना चाहिए ताकि छात्रों की गतिविधियों की जानकारी का आदान-प्रदान हो सके |
ü विषयों के चुनाव में छात्रों को सही मार्ग दर्शन देना चाहिए और उनको स्वेच्छा अनुसार प्रिय विषय चुनने की आजादी भी देनी चाहिए |
निष्कर्ष –
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