लॉरेंस कोह्ल्बर्ग का नैतिक विकास का सिद्धान्त (Lowrence Kohlberg”s Theory of Moral Development)
प्राराम्भिक आयु में बच्चा नैतिकता के सम्प्रत्यय concept से अपरिचित होता है । उसका व्यवहार स्वाभाविक वृत्तियों के द्वारा निर्देशित होता है । उसकी वृत्तियो पर नियन्त्रण के लिए पुरस्कार एवं दण्ड और प्रशसा एवं निंदा की व्यवस्था करता है । इन सबके अतिरिकत बालक स्वय की जो क्रियाए सम्पन्न करता है । उसमें सुख – दुख का अनुभव करता है । मनोवैज्ञानेको ने विषय पर शोध किया कि किस प्रकार बालक स्वाभाविक वृत्तियो से बालक नियत्रित होकर सामाजिक मूल्यो , नियमो व मर्यादाओ के अनुसार नैतिक आचरण को प्रदर्शित करता है । किसी बालक में नैतिक क्षमता का विकास कम होता है । और किसी में ज्यादा होता है । इसलिए नैतिक क्षमता के विकास के संदर्भ में सभी मनोवैज्ञातिक एकमत नहीं है । क्योंकि नैतिक विकास के सिद्धांत भी अनेक है और नैतिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक भी कई होते है ।
फ्रायड़ के अनुसार- जब बालक अपने माता पिता की अभिवृत्तियो व भावनाओ को ग्रहण करता है । तो यह अभिवृतिया और भावनाए ही आगे चलकर बच्चे के विवेक का रूप ग्रहण कर लेती है । बालक नैतिक आचरण के लिए अपने भीतर से निदैशित होता है । इस प्रकार फ्रायड़ ने नैतिक विकास में व्यकित को बाल्यका लीन अनुभूतियो का महत्वपूर्ण स्थान बताया है ।
सीर्यस के अनुसार- बालकों के नैतिक विकास पर समाजी करण और शिशुपालन विधियो की भूमिका को महत्वपूर्ण माना है । बैन्डूरा और वाल्टर्स (Bandra and Walters)
ने बताया है कि बच्चे में नैतिक विकास सामाजिक अधिगम (Social Leaving) का परिणाम होता है । बच्चा आने परिवेश में प्रतिदिन माँडलस के व्यवहार का अनुसरण करके नैतिक आचरण ग्रहण करता है । यहाँ नमूनो या माँडलस से तात्पर्य माता पिता, बड़े भाई बहन या अध्यापक आदि जिनका बच्चे अनुकरण करते है ।
स्किनर (Skinner) ने अधिकतर पुनर्बलन (Reinforcement) का प्रभाव प्रर्शित करते हुए बतलाया है कि नैतिक व्यवहार का विकास दण्ड एवं पुरस्कार पर निर्भर करता है । लेकिन कोह्लबर्ग का सिद्धांत इन सबसे बिल्कुल भिन्न है ।
कोह्लबर्ग की मूल-भूत आवश्यकताएँ (Basic Assumption of
Kohlberg’s Theory)
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Ø कोह्लबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत को अवस्था सिद्धात (Stage Therory) भी कहा गया है । उन्होंने अपने सम्पूर्ण नैतिक विकास को छः अवस्थाओ में विभाजित किया है और इन्हे सार्वभौमिक (Universal) माना है । सार्वभौमिक का यहाँ तात्पर्य यह है कि कोई भी बच्चा हो वह इन अवस्थाओं से होकर अवश्य गुजरता है । नैतिक विकास की ये अवस्थायें एक निश्चित क्रम मे आती है । इस क्रम को बदला नहीं जा सकता है । प्रत्येक अवस्था मे बच्चे की तर्क शक्ति पहले से नए प्रकार की होती है।
Ø जब बच्चा एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश करता है तो उस बच्चे के भीतर नैतिक व्यवहार गुणात्मक परिवर्तन कब और कैसे उत्पन्न होते है ? यह एक विचाणीय और शोध का विषय है । कोह्लबर्ग के अनुसार नैतिक व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन क्रमिक रूप से ही होते है । वे ऐसे ही पैदा नहीं हो जाते है । बच्चा जब किसी अवस्था में प्रवेश करता है तो वह केवल उस अवस्था की ही विशेषतओं का ही प्रदर्शन नही करता, बाल्कि वह अन्य अवस्थाओं की विशेषताओं का भी प्रदर्शन करता है । और अधिकतर मनोवैज्ञानिक उन अन्य विशेषताओं को केवल उसी अवस्था की विशेषता मान लेता है ।
Ø कोह्लबर्ग के एक सहयोगी इलियट टूरियल (Elliat turiel) ने भी माना है कि एक बच्चा प्रायः नैतिक विकास की एक अवस्था के बाद दूसरी अवस्था में प्रविष्ट होता है । परन्तु सभी बच्चे छः अवस्थाओ तक नहीं पहुंच पाते है । नैतिक अवस्था की अन्तिम अवस्था में पहुँचने वाले बच्चो की संख्या बहुत कम होती है । अतः नैतिक तर्क शक्ति या नैतिक चिन्तन के आधार पर बालको में वैयक्तिक भिन्नताए पायी जाती है ।
नैतिक
विकास की
अवस्थाएँ (Stage of
moral development) :
कोह्लबर्ग ने नैतिक विकास की कुल छः अवस्थाओं का वर्णन किया है लेकिन इन्होंने दो – दो अवस्थाओ को एक साथ रखकर उनके तीन स्तर बना दिए है । ये तीन स्तर निम्न प्रकार से है -
(1) पूर्व - रूढिगत
अवस्था (Pre – Conventional Stage)
(2) रूढिगत या
पारम्परिक अवस्था (Conventional Stage)
(1) पूर्व
- रूढिगत अवस्था
(Pre
– Conventional stage) :
जब बालक किसी बाहरी तत्व या किसी भैतिक घटना के संदर्भ मे किसी आचरण को नैतिक अथवा अनैतिक मानता है तो उसकी नैतिक तर्क शक्ति प्री – कन्वैशनल स्तर की कही जाती है । इस स्तर के अन्तर्गत दो अवस्थाएँ आती है -
(i) आज्ञा एवं दण्ड की अवस्था (Stage of order and punishment)
(ii) अंहकार की अवस्था (Stage of Ego)
(i) आज्ञा एवं दण्ड की अवस्था (Stage of order and punishment): कोह्लबर्ग के अनुसार इस अवस्था में बच्चे का चिन्तन दण्ड से प्रभावित होता है । परिवार के सभी सदस्य बच्चे को कुछ कार्य करने के आदेश देते रहते है । इन आदेशो का पालन न करने पर बच्चे को दण्डित किया जाता है । इसलिए बच्चा यह सोचता है कि दण्ड से बचने के लिए आदेश का पालन करना अनिवार्य है । कम आयु में और अपरिपक्व होने के कारण बच्चा किसी कार्य को करने का या न करने का निर्णय इसलिए करता है । क्योँकि वह दंड से डरता है । अर्थात आज्ञाओं का पालन इसलिए करता है । क्योंकि वह दंड से डरता है । अर्थात आज्ञाओं का पालन इसलिए करता है कि वह दंडित न हो । इस प्रकार नैतिक विकास की शुरू की अवस्था में दण्ड को ही बच्चो की नैतिकता का मुख्य आधार माना जाता है ।
(ii) अंहकार की अवस्था (Stage of Ego): इस अवस्था में आकर बच्चे के चिन्तन का स्वरूप बदल जाता है । जैसे – जैसे बच्चे की आयु बढ़ती है वह परिपक्व होता है । तो वह अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओ को समझने लगता हैं और उसके द्वारा उसकी इच्छायें पूरी हो जाती है । यदि उसका कोई उद्देश्य झूठ बोलने से पूरा होता है । तो वह झूठ बोलता है । अगर भूख लगी है । और चुरा कर वह कुछ खा लेता है । तो वह इन क्रियाओं को नैतिक आचरण ही समझता है नैतिक विकास की इस अवस्था का आधार बालक का अंहकार (Ego) होता है ।
(2) रूढिगत
या पारम्परिक अवस्था (Conventional Stage)
इस स्तर को भी दो उप अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है ।
(i)
प्रशंसा की अवस्था (Stage
of Appreciation)
(i) प्रशंसा की अवस्था (Stage
of Appreciation): इस अवस्था में बच्चा जो भी करता है वह दूसरे लोगों के द्वारा उसकी प्रशंसा करने के लिए करता है । जब उसे पाता होता है कि दूसरे लोग उसकी प्रशंसा पाने के लिए ऐसा करते है । दूसरी ओर समाज के सदस्य बच्चो से विशेष अपेक्षायें करने लगते है, तो समाज से उन्हे स्वीकृति मिलने लगती है । इस अवस्था में बच्चे उन्हीं व्यवहारो को उचित व नैतिक मानते है जिनके लिए वे परिवार, स्कूल, पड़ोस मित्र – मण्डली से प्रशंसा प्राप्त करते है । इस प्रकार हम कह सकते है कि इस अवस्था में बच्चे के चिन्तन का स्वरूप समाज और उसके परिवेश से निर्धारित होता है ।
(ii) सामाजिक व्यवस्था के प्रति सम्मान की अवस्था (Stage
of Respect for social system): नैतिक विकास की यह उप – अवस्था अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जाती है । कोह्लबर्ग के अनुसार समाज के ज्यादातर सदस्य नैतिक विकास की इस अवस्था तक पहुंच जाते है । इस अवस्था में प्रवेश से पहले बालक समाज को केवल इसलिए महत्वपूर्ण मानता है कि वह उसकी प्रशंसा करता है । अब वह समाज को स्वयं एक लक्ष्य मानने लगता है । इस अवस्था में पहुँचकर स्वयं यह समझने लगता है । कि सामाजिक नियमो के विरूद्ध प्रत्येक कार्य को अनैतिक कहता है । इस प्रकार हम देखते है कि कोह्लबर्ग ने नैतिक विकास की अवस्थाओं का क्रमिक अध्ययन किया है ।
(3) उत्तर - रूढिगत
अवस्था (Post - Conventional Stage)
कोह्लबर्ग ने अपने तीसरे स्तर को भी दो उप – अवस्थाओ में बाँटा है ।
(i) सामाजिक समझौते
एवं व्यक्तिगत अधिकारों की अवस्था (Stage of social contract
and individual rights)
(ii) विवेक की अवस्था (Stage of Conscience)
(ii) विवेक की अवस्था (Stage of Conscience): कोह्लबर्ग के अनुसार नैतिक विकास की छठी व अन्तिम अवस्था यही होती है । क्योकि इस अवस्था में पहुँचने पर व्यक्ति नैतिकता के बारे में अपना दृष्टिकोण भी विकसित कर लेता है । व्यक्ति में विवेक पैदा हो जाता है । व्यक्ति के अब अच्छे-बुरे उचित – अनुचित आदि विषयों पर स्वंय के व्यकितगत विचार विकसित हो जाते है । अब व्यक्ति के नैतिक विकास का एकमात्र आधार विवेक ही बन जाता है । अब इस अवस्था में व्यक्ति नियमो का पालन स्वंय के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर करने लगता है । इस अवस्था में व्यक्ति अब नियमो की वैद्यता को भी चुनौती देने लगता है । क्योंकि वे नियम उसके विवेक से मेल नहीं खाते है । अब व्यक्ति केवल विवेक के आधार पर ही जीवित रहने का आदी हो जाता है । अब व्यक्ति के लिए वही आचरण नैतिक होगा जो उसके स्वयं के विवेक का समर्थन प्राप्त कर लेगा ।
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