बालकेंद्रित शिक्षा की विशेषताएँ -
बाल केंद्रित शिक्षा का अर्थ शिक्षण की संपूर्ण कार्य योजना बालक के चारो ओर रहनी चाहिए अर्थात कोई भी निर्णय शिक्षा से संबंधित लिया जाता है । तो वह बालक को केंद्र मानकर किया जाना चाहिए अतः बाल केंद्रित शिक्षा की मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार से हैं -
1.
बालकों का ज्ञान (Knowledge of
children) : किसी भी क्षेत्र में अध्यापकों को सफल होने के लिए बाल मनोविज्ञान का ज्ञान अवश्य होना चाहिए ! इसके अभाव में ना तो बालकों की विशेषताओं को ही समझा जा सकता है और ना ही उनकी समस्याओं का समाधान किया जा सकेगा । बालक के संबंध में शिक्षक को बालको के व्यवहार के मूल आधारों आवश्यकताओं मानसिक स्तर, रुचियों योग्यताओं वह व्यक्तित व्यक्तित्व इत्यादि का व्यापक ज्ञान अवश्य होना चाहिए । और व्यवहार के मूल आधारों का ज्ञान तो अत्यंत आवश्यक होता है । क्योंकि शिक्षा उद्देश्य की ही बालक के व्यवहार को विशुद्ध बनाना होता है । जब तक बालक के व्यवहार को विशुद्ध अथवा परिमार्जित नहीं किया जाएगा तब तक शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं किया जा सकता है । विद्यालय में पिछड़े हुए व समस्याग्रस्त विद्यार्थियों की कमी नहीं है । उनमें से अधिकतर बालक जैसे – सड़कों बल्वो का फोड़ना, स्कूल से भाग जाना , अपने बड़ों का सम्मान ना करना, आवारागर्दी करते हैं, अपने मोहल्ले में आस पड़ोस के बालको को पीटते है । अगर मनोविज्ञान के अभाव में एक अध्यापक इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास करता है । तो वह सफल नहीं हो पाएगा। लेकिन इन बालको को समझने वाला शिक्षक यह जानता होता है कि इन दोषों का मूल उनकी शारीरिक सामाजिक मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं में ही कहीं न कहीं है । मनोविज्ञान अध्यापक को बालको के वैयक्तिक भिन्नताओं से परिचित कराता है । और यह बताता है । कि उनमें स्वभाव रुचि व बुद्धि आदि के आधार पर भिनता होती है अतः एक कुशल शिक्षक मन्द बुद्धि सामान्य बुद्धि व तीव्र बुद्धि वाले विद्यार्थियों में अन्तर करके उन्हें उनकी योग्यताओं के अनुसार शिक्षा देता है अतः शिक्षकों को बाल मनोविज्ञान की जानकारी अवश्य होनी होनी चाहिए ।
2.
पाठ्यक्रम – विधालय में किसी भी कक्षा का क्याक्रम वैयकितक भिन्नताओं , प्रेरणाओं, मूल्यो व सीखने के सिद्धांतो के मनोविज्ञान के ज्ञान के आधार पर बनाया जाना चाहिए । पाठ्मक्रम को बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि विधार्थी व समाज की क्या आवश्यकताएँ होती है । और कौन – कौन सी पद्धतियो के द्वारा इन्हे आसानी से सीखा जा सकता है ।
3.
मूल्यांकन व परीक्षण : अध्यापक द्वारा केवल शिक्षण मात्र से ही शिक्षा के क्षेत्र की समस्माएँ समाप्त नहीं हो जाती है । शिक्षण के पश्चात बालको कहां मूल्यांकन व परीक्षण भी अत्यंत आवश्यक होता है । मूल्यांकन से यह पता लगाया जा सकता है की विद्यार्थी ने कितना अधिगम किया है । क्योंकि शिक्षा की प्रक्रिया में अध्यापक व विद्यार्थी के लिए अत्यंत आवश्यक है । अध्यापक के अलावा मूल्यांकन का कार्य अन्य लोग भी करते है । और स्वयं द्वारा भी किया जाता है । सभी प्रकार की मूल्यांकन विधियां मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित होती है । बाल केंद्रित शिक्षा में बालक के मूल्यांकन के लिए बाल मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है ।
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