मनोसामाजिक अहं विकास की अवस्थाओं की विशेषतायें-
एरिक्सन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘childhood and society, 1963’ में मनोसामाजिक अहं विकास की 8 अवस्थायें बतायी है । एरिक्सन के अनुसार विकास की प्रत्येक अवस्था होने का एक आदर्श समय है। प्रत्येक अवस्था क्रमश: एक के बाद एक आती है और व्यक्तित्व क्रमश: विकसित होता जाता है । इनके अनुसार व्यक्तित्व का यह विकास जैविक परिपक्वता तथा समाजिक एवं ऐतिहासिक कालों में अन्त: क्रिया के परिणामस्वरूप होता है । इन मनोसामाजिक विकास की अवस्थाओं की कतिपय महत्त्वपूर्ण विशेषतायें है, जिनका विवेचन निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-
1.
मनोसामाजिक विकास की अवस्था की प्रथम महत्त्वपूर्ण विशेषता “संक्रान्ति” है । संक्रान्ति का अर्थ है- प्राणी के जीवन का एक ऐसा टर्निंग पाइन्ट (Turning paint) जो उस स्थिति में व्यक्ति की जैविक परिपक्वता एवं सामाजिक माँग दोनों के बीच अन्त: क्रिया होने के कारण उत्पन्न होता है।
2. प्रत्येक मनोसामाजिक संक्रान्ति में सकारात्मक (धनात्मक) तथा नकारात्मक (ऋणात्मक) तत्व दोनों ही विद्यमान होते है । प्रत्येक अवस्था में जैविक परिपक्वता एवं नयी-नयी सामाजिक माँगों के कारण द्वन्द्व होना स्वाभाविक ही है यदि व्यक्ति इस द्वन्द्व से बाहर निकल आता है तो उसका व्यक्तित्व स्वस्थ रूप से विकसित होता जाता है और इसके विरीत यदि वह इस समस्या का समाधान नही कर पाता है तो व्यक्तित्व का विकास अवरूद्ध हो जाता है तथा व्यक्तित्व संबंधी कई विकार उत्पन्न हो जाते है।
मनोसामाजिक विकास की प्रत्येक अवस्था में तीन आर होते है है जिन्हें तीन आर (Erikson’s three R’s) की संज्ञा दी गई है । ये तीन आर (R) इस प्रकार है -
a.
कर्मकांडता (Ritualization)
b.
कर्मकांड (Ritual)
c. कर्मकांडवाद (Ritualism)
a. कर्मकांडता (Ritualization) - एरिक्सन के अनुसार कर्मकांडता का अर्थ है- “ समाज के व्यक्तियों के साथ सांस्कृतिक रूप से स्वीकार किये गये तरीके से व्यवहार या अन्त: क्रिया करना।”
b. कर्मकांड (Ritual) : कर्मकांड का अर्थ है-” वयस्क लोगों के समूह द्वारा आवृत्ति स्वरूप की मुख्य घटनाओं को दिखाने के लिये किये गये कार्य।”
c. कर्मकांडवाद (Ritualism) - कर्मकांडता में जो विकार उत्पन्न होता है उसे एरिक्सन ने कर्मकांडवाद का नाम दिया है। इसमें प्राणी स्वयं अपने ऊपर ध्यान केन्द्रित करता है।
1.
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